दुर्योधन ने तब सिर पीट लिया, जब भगवान कृष्ण ने अपने फैसले का आधार इस तथ्य को बताया कि उनकी नजर पहले किस पर पड़ी। वह अर्जुन से पहले उनके पास पहुंचा था मदद मांगने। लेकिन वह बैठा भगवान के सिरहाने, जबकि अर्जुन ने उनके चरणों के पास जगह तलाशी। नतीजा यह कि जब सोते कृष्ण की आंख खुली, तो उन्होंने पहले अर्जुन को देखा। पूछा, तुम यहां कैसे। उठते-उठते नजर घुमाई तो दुर्योधन को भी वहीं मौजूद पाया। उसने कहा कि वह पहले से बैठा है।
लेकिन भगवान का कहना था कि मैंने तो पहले अर्जुन को देखा, सो पहले उसी से पूछूंगा कि उसे क्या चाहिए – एक तरफ मैं हूं और दूसरी तरफ मेरी अक्षौहिणी सेना।
दुर्योधन की सांसें अटक गईं। कुरुक्षेत्र सज चुका है, महाभारत का रण सामने है। पता नहीं अर्जुन क्या चुन लेगा। मगर चयन तो दुर्योधन ही नहीं, अर्जुन का भी मन पहले ही कर चुका था। उसमें कहीं कोई दुविधा नहीं थी, कोई टकराव नहीं था। दोनों के रास्ते बिल्कुल अलग थे। अर्जुन बोला, ‘मुझे भला सेना की क्या परवाह। मुझे तो आपका साथ चाहिए।‘ भगवान का फैसला आ गया, ‘मैं रहूंगा अर्जुन के साथ, दुर्योधन मेरी सेना ले ले।‘
दुर्योधन की बांछें खिल उठीं। मन ही मन अर्जुन की मूर्खता पर प्रसन्न होता, खुशी के मारे फूला न समाता हुआ वह वापस लौटा।
यह न पूछिए कि हममें कौन अर्जुन है और कौन दुर्योधन। कुरुक्षेत्र कोई ऐसा मैदान तो है नहीं कि लड़ाई एक बार हो गई और फिर खत्म। हमारे मन के अंदर कुरुक्षेत्र बार-बार सजता रहता है, हम अपना-अपना पक्ष चुनते रहते हैं। एक लड़ाई का फैसला फिर अगली लड़ाई का आधार बनता है, और यह सिलसिला चलता रहता है। ऐसी ज्यादातर लड़ाइयों में दुविधा यही सामने आती है कि हमें सुविधा-संसाधन चाहिए या सच और सही का साथ।
बेशक, सच और सही को लेकर सबकी अपनी समझ होती है, जो अलग-अलग भी हो सकती है। बल्कि ज्यादातर मामलों में अलग-अलग ही होती है। फिर भी, यह समझ एक हद तक ही भ्रमित कर पाती है। उस हद के बाद यह बिल्कुल साफ होने लगता है कि कौन क्या चुन रहा है। कौन कृष्ण को प्राथमिकता दे रहा है और किसकी नजरें उनकी सेना पर टिकी हैं।
चुनने वाले का मन तो काफी पहले बन चुका होता है। उसका चयन पहले तय हो चुका होता है। मगर बाकी लोग भी तो हैं आसपास। वे कई बार भ्रमित होते हैं। उनके लिए यह मौका होता है कि वे दोनों के चयन को देखते हुए युद्ध शुरू होने से पहले अंतिम रूप से अपना पक्ष चुन लें।
आज की बात करें तो लोकतंत्र बचाने की लड़ाई सामने है। दावा दोनों पक्षों का यही है कि जनता उनके साथ है, सच और सही का प्रतिनिधित्व भी वही कर रहे हैं। लेकिन, हमें तो चयन देखना है उनका। कौन जनता की शक्ति को, उसकी पसंद-नापसंद को प्राथमिकता देता है और कौन संस्थानों की ताकत को।
कौन चुनाव आयोग की बारीक बेईमानियों का आसरा लेता है, विभिन्न दलों के निर्वाचित सांसदों को येन-केन प्रकारेण अपनी ओर करने की बेताबी दिखाता है और कौन युवाओं की आवाज बनने में दिलचस्पी लेता है। दोनों पक्षों ने अपना चयन साफ कर दिया है, अब बारी हमारी-आपकी है। सवाल यही है, जैसा कि एक बड़े कवि ने कहा है, ‘तय करो किस ओर हो तुम, तय करो किस ओर हो, आदमी के पक्ष में हो या कि आदमखोर हो।‘
(स्केच एआई की मदद से)
(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)